हां ! मैं एक नारी हूं
कोरे कागज पर कुछ शब्द उकेरना चाहती हूं। अपने जज्बातों को स्याही के सभी रंग देना चाहती हूं। जीवन के हर मोड़ को एक नया आयाम देना चाहती हूं। हां! मैं एक नारी हूं और अपनी कहानी सबको बताना चाहती हूं। एक नवजात शिशु की तरह खुलकर हंसना चाहती हूं। कुछ अच्छा ना लगे तो दिल खोलकर रोना चाहती हूं। गीली मिट्टी से बार बार लहरों के पास घर बनाना चाहती हूं। हां! मैं एक नारी हूं और फिर से अपना बचपन जीना चाहती हूं। इंद्रधनुष के सातों रंगों को खुद में समेटना चाहती हूं। सूरज की थोड़ी लालिमा माथे पर सजा लेना चाहती हूं। चंद्रमा की थोड़ी शीतलता दिल में बसा लेना चाहती हूं। हां ! मैं एक नारी हूं और सारी सृष्टि को खुद में समा लेना चाहती हूं। रुपाली वर्मा माहेश्वरी बिना पंखों के भी आकाश में उड़ना चाहती हूं। खल खल बहती नदी सी बस आगे बढ़ना चाहती हूं। बेमतलब की जंजीरों से खुद को आजाद करना चाहती हूं। हां ! मैं एक नारी हूं और अपनी शर्तों पर जिंदगी जीना चाहती हूं।