झूठ

झूठ बोलने की कहानी तो है सदियों पुरानी
इंसान के अहम से बांधी है इसकी गठजोड़ की रवानी।

यह है ऐसी काली छाया कोई नहीं इससे बच पाया
खुद को सही साबित करने के लिए सबने इसे अपनाया।

हमने बोला तो ठीक मगर दूसरे का कांटा बन दिल में चुभा सा पाया
बच्चों ने बोला तो दिल को लुभाया और बचपना समझ कर इसे हंसी में भुलाया।

बीज शायद वहीं हमारे मन में पनप गया कि हमारे बोले झूठ में नहीं है कोई बुराई
अगर पता ना चले तो बन जाएगी यही सच्चाई।

नहीं जान पाए कि कब झूठ की इस हम दीमक ने हमें अंदर  से कर दिया खोखला
दूसरों के झूठ का सच तो दिखा मगर अपना आइना हमेशा रहा धुंधला।

दूसरों को गलत साबित करने में ही जीवन बीत जाता है
और खुद का राक्षस दमन करने का ख्याल ही नहीं आता है।

आज ही है वक़्त सुनने के लिए अन्तर्मन की आवाज़
जो कर सकेगी एक स्वार्थहीन जीवन का आगाज़।

होगी तो कठिनाइयों भरी यह दिशा
पर यही  मिटाएगी जीवन की हर निशा।
पर यही  मिटाएगी जीवन की हर निशा।।

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