सामंजस्य
संसार के मानचित्र पर,
जीवन के चलचित्र पर
खुशियों और दुखों के भंवर में फंसा इंसान;
भागता चला जाता है आपनी धुन में
और नहीं देख पता है उनको,
जिनके चेहरे पर सदा एक सौम्य है विद्यमान||
मृगत्रिष्णा में भटकता इंसान
नहीं महसूस कर पता है उन चेहरों की तृप्ति को
जिनके पास अब कुछ खोने को नहीं है शेष |
अपनी ही धुन में वह जीते हैं ज़िन्दगी को
क्योंकि ज़िन्दगी ने कुछ भी छोडे नहीं है उनके अवशेष ||
नहीं डर है उन्हें कुछ चले जाने का
और कुछ पाने पर उसका स्वागत करेंगे वह विशेष |
संसार का सामंजस्य बैठाएं हैं यही लोग
वरना कब तक रसातल में पहुँच गया होता यह मानव लोक ||
nice poem..
ReplyDeletehey ...nice creation rupali.
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